Friday, December 26, 2008

आदि शंकराचार्य की दृष्टि में गुरु तत्व

आदि शंकराचार्य सनातन सांस्कृतिक धारा के प्रमाण पुरुषों में गिने जाते हैं। उन्होंने गुरु वन्दना करते हुए लिखा है-

नमोस्तुगुरवेतस्मैगायत्री रूपिणेसदा। यस्यवागमृतंहन्तिविषंसंसार संज्ञकं॥उन गुरु को नमस्कार है, जो सदा गायत्री रूप में स्थित होते हैं, जिनकी अमृत वाणी संसार रूपी विष को नष्ट कर देती है।

यह बडी सारगर्भित वन्दना है, जिसमें गुरुतत्वके प्रति श्रद्धा के साथ ही उसके स्वरूप एवं प्रभाव को भी बडी सुन्दरता के साथ व्यक्त किया गया है। इस श्लोक में चार चरण हैं-गुरु को नमन, गुरु का गायत्री रूप में स्थित होना, गुरु-वाणी अमृत स्वरूप होना, उससे संसार रूपी निन्दा का शमन होना। क्रमश:प्रत्येक चरण के भावों का समीक्षात्मक अध्ययन करें।

गुरु को नमन-गुरु अपने विषय के विशेषज्ञ होते हैं। उनसे अनुदान पाने के लिए श्रद्धा भाव आवश्यक है। गुरु केवल विधि ही नहीं बतलाते, अपनी शक्ति का, अपने प्राणों का एक अंश भी देने में समर्थ होते हैं। जिस प्रकर पानी का प्रवाह ऊपरी सतह से निचली सतह की ओर होता है, उसी प्रकार चेतना-ज्ञान का प्रवाह श्रद्धास्पद व्यक्तित्व की ओर से नमनशीलव्यक्तित्व की ओर होता है। यह सनातन नियम है। व्यक्ति में पात्रता हो, लेकिन वह नमनशीलन हो, अहंकारी हो, तो उसे कल्याणकारी ज्ञान प्राप्त होना और फलित होना असंभव हो जाता है।

यहां नमस्कार केवल शिष्टाचार वाला हो, तो काम नहीं चलेगा। उसे श्रद्धा से प्रेरित होना चाहिए। किंतु समस्या यह आ जाती है कि श्रद्धा हर जगह नहीं झुकती। गुरु में श्रद्धा को आकर्षित करने की शक्ति होनी चाहिए। यदि पाने वाले में श्रद्धा न हो, तो भी बात नहीं बनती और गुरु में श्रद्धास्पद बनने की क्षमता न हो तो भी नमन की स्थिति नहीं बन पाती। शिष्य को नमनशीलश्रद्धालु होना चाहिए, तो गुरु को भी श्रद्धास्पद होना चाहिए। गुरु कैसे होते हैं, यह बात आगे के चरणों में स्पष्ट की गयी है।

गुरु सदा गायत्री रूप हो-भारतीय संस्कृति के अनुसार गुरु तत्व को व्यक्ति रूप में भी पाया जा सकता है और शक्ति रूप में भी। दोनों ही स्थितियों में उसे गायत्री रूप में प्रतिष्ठित होना चाहिए, ऐसा आचार्य शंकर का मत है। गायत्री का अर्थ है, गय-प्राण,त्री-त्रायते,त्रण-उद्धारकरने वाली शक्ति। प्राण तत्व जब ईश्वरीय अनुशासन में बंधकर व्यक्त होता है, तो सृष्टि के विभिन्न घटक बनते हैं। सृष्टि के उद्भव का, उसे प्रकट करने का यह कार्य ईश्वर का- नियन्ता का है। जो प्राण पदार्थ के साथ संयुक्त होकर प्राणी के रूप में स्थापित हो गए, उन्हें प्राण की मुख्यधारा से जोडे रखना ही प्राणों का त्राण करना है।

जीवन की सारी क्रियाएं प्राण से ही संचालित होती हैं। प्राण में विकार आ जाने से जीवन की सभी क्रियाएं, सारा जीवन विकार ग्रस्त हो जाता है। शारीरिक-मानसिक रोग, तनाव, पाप-वृत्तियां सब इसी प्राण के विकारों की ही उपज हैं। प्राण के प्रकटीकरण का कार्य ईश-तत्व का है और उसके त्राण का कार्य गुरु तत्व का है। इसीलिए गुरु को गायत्री रूप में-प्राणों का त्राण करने वाली साम‌र्थ्य के रूप में सदैव प्रतिष्ठित रहना आवश्यक है। भारतीय संस्कृति में ऋषियों ने इसीलिए यह व्यवस्था बनाई है कि यदि व्यक्ति रूप में गुरु की प्राप्ति न हो सके, तो मन्त्र रूप-शक्ति रूप में गायत्री विद्या को गुरु मानकर आत्म-लाभ किया जा सकता है। इसीलिए अनादि काल से गायत्री मंत्र को गुरु मंत्र के रूप में ऋषियों ने प्रतिष्ठित रखा है।

संसार का विष और गुरु वचनों का अमृत- प्राणी संसार में ही रहता है। यह संसार सत् एवं असत्, अमृत तथा मरणशील तत्वों के संयोग से बना है। जीवन की कलाकारिता इसी में है कि संसार में संव्याप्तविष से बचते हुए व अमृत का उपयोग करते हुए आगे बढा जाए। विष के संसर्ग से प्राण पीडित होते हैं और अमृत के संसर्ग से वे आनंदित होते हैं। प्राणों के विषों की ओर आकर्षित होने से रोक कर उसे अमृत की ओर प्रेरित करने की जीवन कला सिखाने का कार्य गुरु का है। यदि प्राण में विष को नकारने की या अमृत की ओर गतिशील होने की क्षमता नहीं रह गयी है, तो उचित उपचार द्वारा दुर्बल प्राणों को पुन:तेजस्वी बनाना भी गुरु अपने परिष्कृत और प्रखर प्राणों के संयोग से करते हैं।

सही दिशा की प्रेरणा का प्राथमिक प्रवाह वाणी से ही प्रकट होता है। गुरु उस अमृत तत्वयुक्तवाणी को प्रगट करता है और शिष्य उसे धारण करता है। वाणी के साथ समाविष्ट अमृत रूप प्राण शिष्य में स्थित होकर उसकी साधना से परिपक्व होता है। वही परिपक्व प्राण उसे अमृतत्व की दिशा में प्रेरित करता है, गति देकर सद्गति का अधिकारी बनाता है। गायत्री महामंत्र में भी यही चार चरण हैं, भूर्भुव:स्व: में व्याप्त उस महाप्राणको गुरु रूप में नमन्, उसके वरणीय देवत्व युक्त भर्गतेज प्राण को सविता सर्वप्रेरकरूप में स्वीकार करना, उस अमृत प्राण प्रवाह को अपने अंत:करण में धारण करना तथा उस महाप्राणद्वारा जीवन को संचालित किया जाना।

आदि शंकाराचार्यद्रष्टा थे, शिव रूप में थे। उन्होंने गुरु तत्त्‍‌व को इस युग में जिस रूप में फलित होने का संकेत किया है, उसे अपनाकर हम सब लौकिक प्रगति तथा आत्मिक सद्गति के अधिकारी बन सकते हैं।


सूफी काव्य के अग्रदूत बाबा शेख फरीद


सूफी काव्य के अग्रदूत बाबा शेख फरीद

शेख फरीद भारतीय सूफी काव्य के प्रथम और प्रामाणिक हस्ताक्षर हैं। सूफी काव्य के बुनियादी संकल्प शेख फरीद की वाणी में नये उद्बोधन के साथ उभरते हैं। सूफी जीवन दर्शन सामाजिक जीवन के संतुलन पैदा करने वाली जीवन शैली थी। जिसका प्रचार-प्रसार हमें शेख फरीद के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्वमें मिलता है। उत्तरभारत की सूफी परंपरा शेख फरीद के जीवन के दर्शन से केवल प्रभावित ही नहीं रही, बल्कि इसका सही अनुसरण लोक-जीवन में भी मिलता है।

शेख फरीद जीवन के नैतिक मूल्यों की वकालत भी करते हैं तथा इसे आदर्श जीवन का मानदण्ड भी स्वीकार करते हैं। शेख फरीद की वाणी में ऐसे कई पहलू देखे जा सकते हैं। शेख फरीद का जीवन दर्शन केवल किताबी नहीं है, उसमें सही जिन्दगी की वह तस्वीर भी अंकित है जो आलोक-स्तंभ बनकर आस्था के नए स्वरों को जन्म देती है। जीवन की प्रत्येक सच्चाई को शेख फरीद गंभीरतापूर्वक लेते हैं। वे जीवन के धनात्मक मूल्यों के पक्षधर हैं। फरीद की वाणी में मानव जीवन का महाबिम्बविद्यमान है। इस महाबिम्बमें जन्म, शैशव, यौवन और बुढापे का चित्रण बडी खूबसूरती से हुआ है।

वहीं शेख फरीद की वाणी में स्वतंत्र मानव की वह छवि उभरती है, जिसके कारण वह नेक और उमदा इंसान बना हुआ है। शेख फरीद अकाल पुरखपर सौ-प्रतिशत विश्वास करते हैं। रब्बकी रजा उनके लिए अन्तिम फरमान है। वे ज्ञान और क्रिया में केवल विश्वास ही नहीं रखते बल्कि अपनी वाणी में यह भी साबित करते हैं कि भरोसे का खेल हर व्यक्ति के बस की बात नहीं है। अल्ला की जात पर ईमान रखने वाला व्यक्ति उन तमाम सीमाओं को लांघ जाता है, जिसकी अपेक्षा दुनिया में उससे की जाती है। शेख फरीद की स्थापनाओं में धर्म का असली चेहरा रौशन होता है। इस रोशनी में त्याग, सेवा, भाईचारा तथा जीवन के प्रति गहरी निष्ठा अपना कमाल दिखाती है। इस जागरण में आदमी की वह मनोदशा क्रियाशील होती है, जिसकी वजह से उसका मनोबल मानवीय शक्ति में रूपांतरण हो जाता है।

इसके अलावा फरीद वाणी में यह दास्तान बहुआयामी है। फरीद का अनुभव यथार्थवादी है। फरीद उस परम्परा का तत्काल समर्थन नहीं करते, जिसकी अर्थवत्तायुग के अनुरूप नहीं है। वह चाहते हैं कि परंपरा का सांस्कृतिक सम्प्रेषण सीधे लोक जीवन में हो जिसकी सार्थकता शाश्वत काल तक बनी रहे। शेख फरीद की वाणी में ऐसे जीने के कई साक्ष्य मिलते हैं। फरीद वाणी के विकास में यह विमर्श मूल्यवान भी है तथा सम्पूर्ण अखण्ड भी। वास्तव में शेख फरीद के जीवन दर्शन की यही सम्भावना और गहराई है। शेख फरीद की वाणी में हिन्दोस्तानभी हािजर और पंजाब भी। पंजाबी जन-जीवन के सूक्ष्म ब्यौरों से फरीद वाणी नई साहित्यिक विरासत को जन्म देती है।

दर्शन मीमांसा के कई महत्वपूर्ण संदर्भ फरीद वाणी में नव चेतना के साथ दर्ज हुए हैं। सूफी दर्शन का सरलीकरण फरीद वाणी की विशेषता है। कठिन से कठिन सूफी अनुभव फरीद वाणी में सरल बन जाता है। इसीलिए ओशोफरीद वाणी को शीतल-छांग की संज्ञा देते हैं। फरीद की वाणी में आनंद और सुख के श्लोक एक ऐसा सच्चा वातावरण पैदा करते हैं, जिसमें क्षण, दिन-रात तथा पूरा परिवेश नई दिशा को ग्रहण कर लेता है और मौन की करामात अन्तर्तममन पर बरस जाती है। यही विचार फरीद वाणी का केन्द्र है। फरीद वाणी की अन्त‌र्ध्वनियांसम्पूर्ण सत्य का उद्घाटन कर देती है।

छायारूपइस जगत को उस महान् अस्तित्व से जोड देती है, जिसका सरोकार उस सत्य से होता है जिसकी असलियत अंधेरे और प्रकाश के संघर्ष में जन्म ले रही होती है। शेख फरीद चाहते हैं कि उन अंधेरे रास्तों को सदा के लिए प्रकाशमान बना दिया जाए जो हर आदमी को स्वतंत्रता, आत्मविश्वास और सौहार्द से वंचित रखता है। फरीद चाहते हैं कि सच्चा इन्सान खुदा पर विश्वास रखे, अपने सत्य को पाने का विश्वास करे तथा तार्किक और बौद्धिक उलझनों में न उलझकर गहन समक्ष से उस सत्य को प्राप्त कर ले, जिसके लिए वह भटक रहा है। फरीद वाणी का यही जीवन्त महान् उपदेश है। बाबा शेख फरीद के पास भी लोगों को अजर और अमर बनाने की नैतिक शिक्षाओं की महान औषधि थी। यह औषधि मन और तन निरोग कर देती थी।

यही कारण है कि शेख फरीद का फलसफा पूरे हिन्दोस्तानमें भाईचारे के सन्देश के साथ फैला।

शेख फरीद समाज में ऐसा माहौल बनाना चाहते थे, जिसके माध्यम से नये दर्शनशास्त्र की मिसाल कायम हो सके। उन्हें यह अहसास था कि दुनिया में रहने वाले रब्बके बन्दे तभी शान्ति से रह सकते हैं यदि प्रेम की सरिता अविरल बहे। मन की तडप, प्रभु को पा लेने की इच्छा तभी स्थिर हो सकती है यदि सच्चे ईश्वर के प्रति न खत्म होने वाली ललक पैदा हो जाए। पंजाबी साहित्य में जो दीपक शेख फरीद जी ने बिरहा की अग्नि वाला जलाया, वह आज तक पंजाबी काव्य में अपनी आभा बिखेर रहा है। शेख फरीद भारतीय भाषाओं में बिरहा के भी पहले कवि हैं। पंजाब का यह सौभाग्य है कि हर बरस बाबा शेख फरीद का पर्व श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। बाबा शेख फरीद को याद करने का अर्थ है, उस सांझे भाईचारे को याद करना, जिसके कारण पंजाब न हिंदू और न मुसलमान बल्कि वह तो महान विरासत है जिसके कण-कण में बाबा शेख फरीद का महान संदेश छुपा हुआ है। बाबा शेख फरीद ने पंजाबियों को भरे-पूरे जीवन की जांच सिखलाई।

निकुंज की कुंजी रखें स्वामी हरिदास



श्रीबांकेबिहारीजीमहाराज को वृंदावन में प्रकट करने वाले स्वामी हरिदासजी का जन्म भगवान श्रीकृष्ण के कुलगुरु गर्गाचार्यके वंश में, विक्रम सम्वत्1535में भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी (श्रीराधाष्टमी) के ब्रह्म मुहूर्त में हुआ था। आपके पिताश्रीआशुधीरजी अपने उपास्य श्रीराधा-माधवकी प्रेरणा से पत्नी गंगादेवीके साथ अनेक तीर्थो की यात्रा करने के पश्चात् अलीगढ जनपद की कोल तहसील में व्रज की कोर पर आकर एक गांव में बस गए। श्रीहरिदासजीका व्यक्तित्व बडा ही विलक्षण था। वे बचपन से ही एकान्त-प्रिय थे। उन्हें अनासक्त भाव से भगवद्-भजनमें लीन रहने से बडा आनंद मिलता था। वे जब कोई भजन गाते थे या कोई रागिनी छेडते थे, तब गांव भर के स्त्री-पुरुष, बूढे-बच्चे अपना काम छोडकर वहां पहुंच जाते और उनके मंत्रमुग्धकारीराग को सुनकर आनंद-रस में निमग्न हो जाते। श्रीहरिदासजी का कण्ठ बडा मधुर था तथा उनमें संगीत की अपूर्व प्रतिभा थी। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। उनका गांव उनके नाम से विख्यात हो गया।

हरिदासजी को उनके पिता ने यज्ञोपवीत-संस्कार के उपरान्त वैष्णवी दीक्षा प्रदान की। युवा होने पर माता-पिता ने उनका विवाह हरिमति नामक परम सौंदर्यमयीएवं सद्गुणीकन्या से कर दिया, किंतु स्वामी हरिदासजी की आसक्तितो अपने श्यामा-कुंजबिहारी के अतिरिक्त अन्य किसी में थी ही नहीं। उन्हें गृहस्थ जीवन से विमुख देखकर उनकी पतिव्रता पत्नी ने उनकी साधना में विघ्न उपस्थित न करने के उद्देश्य से योगाग्निके माध्यम से अपना शरीर त्याग दिया और उनका तेज स्वामी हरिदासके चरणों में लीन हो गया। समाज ने अनुमान लगाया कि हरिमतिके हाथों में पहनी हुई लाख की चूडियों में दीपक की लौ छू जाने से यह घटना घटी।

विक्रम सम्वत्1560में पच्चीस वर्ष की अवस्था में श्रीहरिदासवृन्दावन पहुंचे। वहां उन्होंने निधिवनको अपनी तपोस्थलीबनाया। स्वामीजीके वृंदावन पहुंचते ही श्रीधामका दिव्य स्वरूप प्रकट हो गया। हरिदासजी निधिवनमें सदा श्यामा-कुंजबिहारी के ध्यान तथा उनके भजन में तल्लीन रहते थे। स्वामीजीके स्तवन से संतुष्ट होकर प्रिया-प्रियतम की युगल छवि श्रीबांकेबिहारीजीमहाराज के रूप में प्रतिष्ठित हुई। हरिदासजीके ये लाडिले ठाकुर आज असंख्य भक्तों के इष्टदेव हैं।

वैष्णव स्वामी हरिदासको श्रीराधा-स्वरूपाललिता का अवतार मानते हैं। श्रीमती राधारानीकी प्रतिबिम्ब-रूपा होने से ललिता को निकुंज-लीला की सभी सखियों-सहचारियों में प्रधान माना गया है। निकुंज में नित्य लीलारतप्रिया-प्रियतम की सेवा में ललिता सदैव तत्पर रहती हैं। राधारानीके ललिता-स्वरूप में अवतरित होने के प्रसंग को बैनी-गूंथन नामक निकुंज-लीला के रूप में राधाष्टमीके दिन प्रस्तुत किया जाता है। श्यामा-कुंजबिहारी के नित्य विहार का मुख्य आधार संगीत है। उनके रास-विलास से अनेक राग-रागनियां उत्पन्न होती हैं। ललिता संगीत की अधिष्ठात्री मानी गई हैं। इसी कारण ललितावतारस्वामी हरिदाससंगीत के परम आचार्य थे। लेकिन उनका संगीत उनके अपने आराध्य की उपासना को समर्पित था, न कि किसी राजा-महाराजा के लिये। बैजूबावरा जैसे अमर गायक तथा तानसेनजैसे विश्व-विख्यात संगीतज्ञ स्वामीजीके ही शिष्य थे। मुगल सम्राट अकबर उनका संगीत सुनने के लिए रूप बदलकर वृन्दावन आया था। विक्रम सम्वत्1630में स्वामी हरिदासका निकुंजवासनिधिवनमें हुआ।

स्वामीजीके आराध्य द्वापरयुगमें प्रकटे देवकी नंदन श्रीकृष्ण न होकर नित्य निकुंजलीलामें रत श्यामा-कुंजबिहारी हैं। उन्होंने अनन्य रसिक सखी भाव से निकुंजोपासनाकी। हरिदासजी के आराध्य श्यामा-श्याम नित्य हैं, वे अवतार नहीं अवतारीहैं, आनन्द-स्वरूप हैं, जो रस-भूमि वृन्दावन के सघन निकुंजोंके मध्य विहार करते हुए नित्य नवीन लीलारतहैं। स्वामी जी ने एक नवीन पंथ सखी-सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया। उनके द्वारा निकुंजोपासनाके रूप में श्यामा-कुंजबिहारी की उपासना-सेवा की अभिनव पद्धति विकसित हुई, जो कि बडी विलक्षण है। निकुंजोपासनामें जो सखी-भाव है, वह गोपी-भाव नहीं है। निकुंज-उपासक प्रभु से अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता, बल्कि उसके समस्त कार्य अपने आराध्य को सुख प्रदान करने हेतु होते हैं। श्रीनिकुंजविहारीकी प्रसन्नता और संतुष्टि उसके लिए सर्वोपरि होती है।

स्वामी हरिदासके मत से इच्छाद्वैतउपासना सर्वोत्तम है। नित्य तत्व के नित्य निरन्तर विलास को ही नित्य-विहार कहते हैं। साधकों का मानना है कि नित्य-विहार रस की कुंजी स्वामी हरिदासके अधिकार में है, अत:निकुंजोपासनामें प्रवेश के लिए इनकी अनुमति एवं अनुकम्पा आवश्यक है।

राधाष्टमीके पावन पर्व में स्वामी हरिदासका पाटोत्सव(जन्मोत्सव) वृंदावन में बडे धूमधाम के साथ मनाया जाता है। सायंकाल मंदिर से चाव की सवारी निधिवनमें स्थित उनकी समाधि पर जाती है। ऐसा माना जाता है कि ललितावतारस्वामी हरिदासकी जयंती पर उनके लाडिले ठाकुर बिहारीजीमहाराज उन्हें बधाई देने श्रीनिधिवनराजपधारते हैं। देश के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ निधिवनमें स्वामीजीकी समाधि के समक्ष अपना संगीत प्रस्तुत करके उनका आशीर्वाद लेते हैं।

वैदिक विद्याओं के संपादक : महर्षि वेदव्यास


महर्षि वेदव्यासभगवान विष्णु के कालावतारमाने गए हैं। कलियुग में पाप के प्रबल और पुण्य के क्षीण होने से मनुष्य की आयु, बौद्धिक प्रतिभा एवं आध्यात्मिक शक्ति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडा है। आज संपूर्ण वैदिक ज्ञान रखने वाले पृथ्वी पर दुर्लभ हो गए हैं। वैदिक यज्ञों-अनुष्ठानों का लोप होता जा रहा है। सर्वज्ञ भगवान से यह बात छिपी नहीं थी, अत:जीवों के कल्याण के लिए स्वयं श्रीहरिद्वापरयुगके अंतिम चरण में ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के पौत्र महर्षि पराशरके अंश से कैवर्तराजकी पोष्यपुत्रीसत्यवती के गर्भ द्वारा महर्षि व्यास के रूप में अवतरित हुए।

व्यासजीका जन्म द्वीप में होने से इनका नाम द्वैपायन पडा। श्यामवर्ण का शरीर होने से ये कृष्णद्वैपायन कहलाए। जन्म लेते ही इन्होंने अपनी माता से जंगल में जाकर तपस्या करने की इच्छा प्रकट की। प्रारंभ में इनकी माता ने इन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया, किन्तु अन्त में माता के स्मरण करते ही तत्काल उनके पास आने का वचन देकर इन्होंने माँ की अनुमति प्राप्त कर ली। ये तप करने के लिए हिमालय चले गए और वहाँ नर-नारायण की साधनास्थलीबदरीवनमें तपस्या की। इससे इनकी बादरायण नाम से प्रसिद्धि हो गई।

महर्षि व्यास अलौकिक शक्ति-संपन्न महाविद्वानहैं। लोगों को आलसी, अल्पायु, मंदमतिऔर पापरतदेखकर इन्होंने वेद का विभाजन किया। मनुष्यों की धारणा-शक्ति को कमजोर होते देख व्यासजीने वेद को ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद-इनचार भागों में विभाजित किया और एक-एक वैदिक संहिता अपने चार प्रमुख शिष्यों को पढाई। उन्होंने पैलको ऋग्वेद, वैशम्पायनको यजुर्वेद, जैमिनिको सामवेद तथा सुमन्तुको अथर्ववेदका संपूर्ण अध्ययन कराया। तत्पश्चात प्रत्येक संहिता की फिर अनेक शाखा-प्रशाखाएं हुई। इस प्रकार इन्हीं के द्वारा वैदिक वाङ्गमयका सम्पादन और विस्तार हुआ। व्यास का शाब्दिक अर्थ है विस्तार। वेदों का विस्तार इनके माध्यम से होने के कारण इनका नाम वेदव्यास पडा, जो कि इनके अन्य नामों की अपेक्षा सर्वाधिक लोकप्रिय भी है। समाज का कोई भी वर्ग वैदिक विद्याओं के ज्ञान से वंचित न रहे, इसलिए महर्षि वेदव्यासने महाभारत की रचना की। कहा जाता है कि स्वयं भगवान गणेश ने इस महान ग्रंथ को लिपिबद्ध किया था। इनके द्वारा प्रणीत महाभारत को मनीषी पंचम वेद मानते हैं। श्रीमद्भगवद्गीताइस महाभारत का ही अंश है। व्यासजीने महाभारत को सर्वप्रथम अपने पांचवें प्रमुख शिष्य लोमहर्षणजीको पढाया था।

वेदान्त-दर्शन के साथ अनादि पुराण को लुप्त होते देखकर श्रीवेदव्यासने अट्ठारह पुराणों का प्रणयन किया। उपनिषदों का सार-तत्व समझाने के लिए इन्होंने ब्रह्मसूत्र का निर्माण किया, जिनपर शंकराचार्य, वल्लभाचार्यआदि अनेक महाविद्वानोंने भाष्य-रचना कर अपना-अपना अलग मत स्थापित किया। व्यास-स्मृति के नाम से रचा हुआ इनका एक स्मृतिग्रंथभी उपलब्ध होता है। इस प्रकार भारतीय वाङ्गमयएवं हिन्दू संस्कृति पर वेदव्यासजीका बहुत बडा ऋण है। ये श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण के प्रधान व्याख्याता हैं। सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में इनका विशिष्ट योगदान है। व्यास-जन्मतिथि आषाढी पूर्णिमा गुरुपूर्णिमा के रूप में महापर्वबन गई है, जिसे प्रतिवर्ष अत्यंत श्रद्धा एवं उत्साह के साथ सनातन धर्मावलम्बी मनाते हैं। गुरु-शिष्य परम्परा को सुदृढ बनाने के उद्देश्य से व्यास-पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।

संसार को श्रीमद्भगवद्गीताजैसा अनुपम आध्यात्मिक रत्न श्रीवेदव्यासकी कृपा से ही प्राप्त हुआ। इन्होंने ही भगवान श्रीकृष्ण के उस अमर उपदेश को अपनी महाभारत में ग्रंथित कर उसे संपूर्ण विश्व के लिए सुलभ बना दिया। प्राणियों के कल्याण की कामना से भक्ति-रस के सागर को महर्षि व्यास ने श्रीमद्भागवत महापुराणके 18हजार श्लोकों में बांध दिया है।

दिव्य तेज, असीम शक्ति एवं असाधारण गुणों से संपन्न महर्षि व्यास को मनीषियोंने त्रिदेवोंकी समकक्षताप्रदान की है-

अचतुर्वदनोब्रह्मा द्विबाहुपरोहरि:।

अभाललोचन:शम्भुर्भगवान्बदरायण:॥

श्रीव्यासदेव चतुर्मुख न होते हुए भी ब्रह्मा, दो भुजाओं वाले होते हुए भी दूसरे विष्णु तथा त्रिनेत्रधारीन होने पर भी साक्षात् शिव ही हैं।

इसीलिए इनकी स्तुति में यह कहा गया है-

नमोऽस्तुतेव्यास विशालबुद्धे

फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र।

येन त्वयाभारततैलपूर्ण:

प्रज्वालितो ज्ञानमय: प्रदीप:॥

खिले हुए कमल की पंखुडी के समान बडे-बडे नेत्रों वाले महाबुद्धिमानव्यासदेव!आपने अपने महाभारतरूपीतेल के द्वारा दिव्य ज्ञानमय दीपक को प्रकाशित किया है, आपको नमस्कार है।

वस्तुत:वेद भारतीय संस्कृति के प्राण हैं। भारतीय धर्म, दर्शन, अध्यात्म, आचार-विचार, रीति-नीति, विज्ञान-कला आदि सभी कुछ वेद से ही अनुप्राणित है। हमारे जीवन और साहित्य की ऐसी कोई विधा नहीं है, जिसका बीज वेद में न मिले। सही मायनों में वेद हमारी सभ्यता की आधारभूमिहै। महर्षि वेदव्यासने वेद के विभाजन का युगान्तकारीकार्य करके इस अथाह ज्ञान-राशि को लोकहित में संपादित कर दिया। महाभारत के माध्यम से वेदांशसमाज के सभी वर्गो तक पहुँचाया। ऐसे अवतारीमहापुरुष का अवतरण-दिवस सबके लिए गुरु पूर्णिमा के रूप में सत्प्रेरणाका महापर्वबन गया है।


मानवता के संदेश वाहक श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी



दिव्य आत्माओं द्वारा रचित एवं उच्चरित गुरु ग्रन्थ साहिब आध्यात्मिक काव्य का एक ऐसा देदीप्यमान संग्रह है, जो न केवल अध्यात्म वरन् जीवन संघर्ष के हर क्षेत्र में मानवीय आदर्शो को अक्षुण्ण रखने का संदेशवाहक है। एक ऐसा संदेशवाहक जिसके संदेश किसी खास धर्म,जाति या देश के लिए न होकर समूची मानवजाति के लिए है। ऐसे बहुलवादीधर्मग्रन्थ का संपादन पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी ने किया। गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पहला प्रकाश 16अगस्त 1604को हरिमंदिरसाहिब अमृतसर में हुआ। पंथ की बुजुर्ग और महान शख्सियत बाबा बुढ्ढाजी को पहला ग्रन्थी नियुक्त किया गया। मगर 1705में दमदमा साहिब में दशमेशपिता गुरुगोविंदसिंह जी ने गुरु तेगबहादुरजी के 116शबदजोडकर इसको पूर्ण किया। इस वर्ष हम गुरुग्रन्थ साहिब के समापनाकी 300वींवर्षगांठ मना रहे हैं।

गुरु ग्रन्थ साहिब का संकलन गुरु अर्जुन देव जी की मानव जाति की बडी देन थी। उस वक्त सामाजिक, धार्मिक, नैतिक मूल्यों का निरन्तर क्षरण हो रहा था। मानव हृदय नित अशांत व चिंतातुर हो रहा था। धर्मान्ध मुगल सत्ता से पीडित हर कोई प्रतिक्रिया, प्रतिहिंसा और प्रतिकार की आग में जल रहा था। कथित रचनाकार स्वलिखित आडंबर प्रेरित रचनाओं को गुरुओं की रचना बताकर पेश कर रहे थे। ऐसे में गुरु उपदेशों में अपने जीवन की सार्थकता ढूंढ रहे असंख्य लोगों में भ्रम उत्पन्न हो रहा था। साथ ही तत्कालीन सामाजिक परिवेश में जरूरत थी, ऐसे ग्रंथ की जो आत्म-संशय से जूझ रहे अल्पशिक्षितलोगों को भी अध्यात्मिक मार्गदर्शन दे सके। गुरु अर्जुन देव जी ने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए अपने पूर्ववर्ती गुरुओं की वाणी को संकलित किया। उनको राग के अनुसार बांट कर परिष्कृत किया। अन्य किसी धर्म के पावन ग्रन्थ में, वे चाहे कितने भी पूजित-वदित क्यों न हो, अन्य वाणियों को स्थान नहीं मिला। मगर गुरु ग्रन्थ साहिब में सर्वधर्म सद्भाव का ऐसा स्फुरण है, जिसके लिए जाति-पाति, धर्म के तमाम भेद गौण है। गौरतलब है कि गुरुग्रन्थ साहिब में मात्र सिख गुरुओं के ही उपदेश नहीं हैं, वरन् 30अन्य हिंदू और मुस्लिम भक्तों की वाणी भी सम्मिलित है। जहां जयदेवजीऔर परमानंदजीजैसे ब्राह्मण भक्तों की वाणी है, वहीं जाति-पांति के आत्महंताभेदभाव से ग्रस्त तत्कालीन समाज में हेय समझे जाने वाली जातियों के प्रतिनिधि दिव्य आत्माओं जैसे कबीर जी, रविदासजी,नामदेव जी, सैणजी, सघनाजी, छीवाजी,धन्नाकी वाणी भी सम्मिलित है। पांचों वक्त नमाज पढने में विश्वास रखने वाले शेख फरीद के श्लोक भी गुरुग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। अपनी भाषायी अभिव्यक्ति, दार्शनिकता,संदेश की दृष्टि से गुरु ग्रन्थ साहिब अद्वितीय है। इसकी भाषा की सरलता, सुबोधता,सटीकताजहां जनमानस को आकर्षित करती है। वहीं संगीत के सुरों व 31रागों के प्रयोग ने आत्मविषयकगूढ आध्यात्मिक उपदेशों को भी मधुर व सारग्राही बना दिया है। गुरु ग्रन्थ साहिब जाति, मत, पाखंड और परिपाटी से ऊपर उठने का संदेशवाहक है। यह ग्रन्थ समूची मानवजाति को एक पिता ऐकसके हम बारिक समझ कर साम्प्रदायिक सौहार्द और भाईचारे का सन्देश देता है। इस दिव्य संकलन के सारगर्भित उपदेश धार्मिक सद्भावना की ज्योति जलाते हैं और मानव मात्र में अ‌र्न्तनिहितएकता की ओर हमारा ध्यान खींचते हैं। खत्री ब्राह्मण सूद वैस,उपदेश चहुवरना को साझा, गुरमुखनाम जपैउघरेसै,कल महिघटिघटिनानक माझा।

गुरु ग्रन्थ साहिब के अंदर सभी शब्दों में परमपिता परमेश्वर की सर्वव्यापकता,अनेक रूपता को चित्रित किया गया है। गुरुवाणीअनुसार परमात्मा किसी एक धर्म, देश, मत या भाषा से बंधा नहीं है। वास्तव में जब हम परमेश्वर की अनंतता को सीमाओं में बांध देते है,तभी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब में उल्लेखितदार्शनिकताकर्मवाद को मान्यता देती है। गुरुवाणीके अनुसार व्यक्ति अपने कर्मो के अनुसार ही महत्व पाता है। समाज की मुख्य धारा से कटकर संन्यास में ईश्वर प्राप्ति का साधन ढूंढ रहे साधकों को गुरुग्रन्थ साहिब सबक देता है। हालांकि गुरु ग्रन्थ साहिब में आत्मनिरीक्षण,ध्यान का महत्व स्वीकारा गया है, मगर साधना के नाम पर परित्याग, अकर्मण्यता, निश्चेष्टताका गुरुवाणीविरोध करती है। गुरुवाणीके अनुसार ईश्वर को प्राप्त करने के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व से विमुख होकर जंगलों में भटकने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर हमारे हृदय में ही है, उसे अपने आन्तरिक हृदय में ही खोजने व अनुभव करने की आवश्यकता है।

फरीदाजंगल-जंगल किया भवहिवणिकंडा मोडेहिवरनीरब हि आलीअे,जंगल निआठुठेहि॥ईश्वरीय प्रेम के दिव्य संदेश के साथ-साथ गुरुग्रन्थ साहिब हमें अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति भी उत्तरदायी होने की सीख देता है। गुरुवाणीब्रह्मज्ञान से उपजी आत्मिक शक्ति को लोककल्याण के लिए प्रयोग करने की प्रेरणा देती है। मधुर व्यवहार और विनम्र शब्दों के प्रयोग द्वारा हर हृदय को जीतने की सीख दी गई है। मिठत नीवी नानकागुण चंगिआईयातत गुरु ग्रंथसाहिबके अंदर धर्म के नाम पर आडंबरों आधार विहीन रीतिरिवाजों और अंधविश्वासों पर कडा प्रहार किया गया है। साथ ही सामाजिक बुराइयों के खिलाफ चेतना भी कायम की गई है।

इस प्रकार गुरु ग्रन्थ साहिब जहां तत्कालीन सामाजिक धार्मिक राजनैतिक परिस्थितियों का आइना है, गुलामी और अत्याचार सहने को अपनी नियति मान चुके लोगों के सोए हुए स्वाभिमान व आत्मबल को जगाने की कोशिश थी। वहीं आधुनिक संदर्भ में इनके सारगर्भित उपदेश उतने ही प्रासंगिक हैं। जीवन क्षेत्र में आने वाली किसी कठिनाई,निराशा या संशय की स्थिति में हम गुरुग्रंथ साहिब से मार्गदर्शन ले सकते हैं।

महिमा गुरु हरगोबिन्द साहिब की


साहिब की सिक्ख इतिहास में गुरु अर्जुन देव जी के सुपुत्र गुरु हरगोबिन्दसाहिबकी दल-भंजन योद्धा कहकर प्रशंसा की गई है। गुरु हरगोबिन्दसाहिब की शिक्षा दीक्षा महान् विद्वान् भाई गुरदास की देख-रेख में हुई। गुरु जी को बराबर बाबा बुड्डाजी का भी आशीर्वाद प्राप्त रहा। छठे गुरु ने सिक्ख धर्म, संस्कृति एवं इसकी आचार-संहिता में अनेक ऐसे परिवर्तनों को अपनी आंखों से देखा जिनके कारण सिक्खीका महान् बूटा अपनी जडे मजबूत कर रहा था। विरासत के इस महान पौधे को गुरु हरगोबिन्दसाहिब ने अपनी दिव्य-दृष्टि से सुरक्षा प्रदान की तथा उसे फलने-फूलने का अवसर भी दिया। अपने पिता श्री गुरु अर्जुन देव की शहीदी के आदर्श को उन्होंने न केवल अपने जीवन का उद्देश्य माना, बल्कि उनके द्वारा जो महान कार्य प्रारम्भ किए गए थे, उन्हें सफलता पूर्वक सम्पूर्ण करने के लिए आजीवन अपनी प्रतिबद्धता भी दिखलाई।

बदलते हुए हालातों के मुताबिक गुरु हरगोबिन्दसाहिब ने शस्त्र एवं शास्त्र की शिक्षा भी ग्रहण की। वह महान योद्धा भी थे। विभिन्न प्रकार के शस्त्र चलाने का उन्हें अद्भुत अभ्यास था। गुरु हरगोबिन्दसाहिब का चिन्तन भी क्रान्तिकारी था। वह चाहते थे कि सिख कौम शान्ति, भक्ति एवं धर्म के साथ-साथ अत्याचार एवं जुल्म का मुकाबला करने के लिए भी सशक्त बने। वह अध्यात्म चिन्तन को दर्शन की नई भंगिमाओं से जोडना चाहते थे। गुरु- गद्दी संभालते ही उन्होंने मीरी एवं पीरी की दो तलवारें ग्रहण की। मीरी और पीरी की दोनों तलवारें उन्हें बाबा बुड्डाजीने पहनाई। यहीं से सिख इतिहास एक नया मोड लेता है। गुरु हरगोबिन्दसाहिब मीरी-पीरी के संकल्प के साथ सिख-दर्शन की चेतना को नए अध्यात्म दर्शन के साथ जोड देते हैं। इस प्रक्रिया में राजनीति और धर्म एक दूसरे के पूरक बने। गुरु जी की प्रेरणा से श्री अकाल तख्त साहिब का भी भव्य अस्तित्व निर्मित हुआ। देश के विभिन्न भागों की संगत ने गुरु जी को भेंट स्वरूप शस्त्र एवं घोडे देने प्रारम्भ किए। अकाल तख्त पर कवि और ढाडियोंने गुरु-यश व वीर योद्धाओं की गाथाएं गानी प्रारम्भ की। लोगों में मुगल सल्तनत के प्रति विद्रोह जागृत होने लगा। गुरु हरगोबिन्दसाहिब नानक राज स्थापित करने में सफलता की ओर बढने लगे। जहांगीर ने गुरु हरगोबिन्दसाहिब को ग्वालियर के किले में बन्दी बना लिया। इस किले में और भी कई राजा, जो मुगल सल्तनत के विरोधी थे, पहले से ही कारावास भोग रहे थे। गुरु हरगोबिन्दसाहिब लगभग तीन वर्ष ग्वालियर के किले में बन्दी रहे। महान सूफी फकीर मीयांमीर गुरु घर के श्रद्धालु थे। जहांगीर की पत्‍‌नी नूरजहांमीयांमीर की सेविका थी। इन लोगों ने भी जहांगीर को गुरु जी की महानता और प्रतिभा से परिचित करवाया। बाबा बुड्डाव भाई गुरदास ने भी गुरु साहिब को बन्दी बनाने का विरोध किया। जहांगीर ने केवल गुरु जी को ही ग्वालियर के किले से आजाद नहीं किया, बल्कि उन्हें यह स्वतन्त्रता भी दी कि वे 52राजाओं को भी अपने साथ लेकर जा सकते हैं। इसीलिए सिख इतिहास में गुरु जी को बन्दी छोड दाता कहा जाता है। ग्वालियर में इस घटना का साक्षी गुरुद्वारा बन्दी छोड है। अपने जीवन मूल्यों पर दृढ रहते गुरु जी ने शाहजहां के साथ चार बार टक्कर ली। वे युद्ध के दौरान सदैव शान्त, अभय एवं अडोल रहते थे। उनके पास इतनी बडी सैन्य शक्ति थी कि मुगल सिपाही प्राय: भयभीत रहते थे। गुरु जी ने मुगल सेना को कई बार कडी पराजय दी। गुरु हरगोबिन्दसाहिब ने अपने व्यक्तित्व और कृत्तित्वसे एक ऐसी अदम्य लहर पैदा की, जिसने आगे चलकर सिख संगत में भक्ति और शक्ति की नई चेतना पैदा की। गुरु जी ने अपनी सूझ-बूझ से गुरु घर के श्रद्धालुओं को सुगठित भी किया और सिख-समाज को नई दिशा भी प्रदान की। अकाल तख्त साहिब सिख समाज के लिए ऐसी सर्वोच्च संस्था के रूप में उभरा, जिसने भविष्य में सिख शक्ति को केन्द्रित किया तथा उसे अलग सामाजिक और ऐतिहासिक पहचान प्रदान की। इसका श्रेय गुरु हरगोबिन्दसाहिब को ही जाता है।

गुरु हरगोबिन्दसाहिब जी बहुत परोपकारी योद्धा थे। उनका जीवन दर्शन जन-साधारण के कल्याण से जुडा हुआ था। यही कारण है कि उनके समय में गुरमतिदर्शन राष्ट्र के कोने-कोने तक पहुंचा। श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के महान संदेश ने गुरु-परम्परा के उन कार्यो को भी प्रकाशमान बनाया जिसके कारण भविष्य में मानवता का महा कल्याण होने जा रहा था।

गुरु जी के इन अथक प्रयत्‍‌नों के कारण सिख परम्परा नया रूप भी ले रही थी तथा अपनी विरासत की गरिमा को पुन:नए संदर्भो में परिभाषित भी कर रही थी। गुरु हरगोबिन्दसाहिब की चिन्तन की दिशा को नए व्यावहारिक अर्थ दे रहे थे। वास्तव में यह उनकी आभा और शक्ति का प्रभाव था। गुरु जी के व्यक्तित्व और कृत्तित्वका गहरा प्रभाव पूरे परिवेश पर भी पडने लगा था। गुरु हरगोबिन्दसाहिब जी ने अपनी सारी शक्ति हरमन्दिरसाहिब व अकाल तख्त साहिब के आदर्श स्थापित करने में लगाई। गुरु हरगोबिन्दसाहिब प्राय: पंजाब से बाहर भी सिख धर्म के प्रचार हेतु अपने शिष्यों को भेजा करते थे।

गुरु हरगोबिन्दसाहिब ने सिक्ख जीवन दर्शन को सम-सामयिक समस्याओं से केवल जोडा ही नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवन दृष्टि का निर्माण भी किया जो गौरव पूर्ण समाधानों की संभावना को भी उजागर करता था। सिख लहर को प्रभावशाली बनाने में गुरु जी का अद्वितीय योगदान रहा।

गुरु जी कीरतपुर साहिब में ज्योति-जोत समाए। गुरुद्वारा पातालपुरीगुरु जी की याद में आज भी हजारों व्यक्तियों को शान्ति का संदेश देता है। भाई गुरुदास ने गुरु हरगोबिन्दसाहिब की गौरव गाथा का इन शब्दों में उल्लेख किया है: पंज पिआलेपंजपीर छटम्पीर बैठा गुर भारी, अर्जुन काया पलट के मूरत हरगोबिन्दसवारी,

चली पीढीसोढियांरूप दिखावनवारो-वारी,

दल भंजन गुर सूरमा वडयोद्धा बहु-परउपकारी॥

संत नामदेव के गोविंद


निर्गुण संतों में अग्रिम संत नामदेव वस्तुत:उत्तर-भारत की संत परंपरा के प्रवर्तक माने जाते हैं। मराठी संत-परंपरा में तो वह सर्वाधिक पूज्य संतों में हैं। मराठी अभंगों(विशेष छंद) के जनक होने का श्रेय भी उन्हीं को प्राप्त है। उत्तर-भारत में विशेषकर पंजाब में उनकी ख्याति इतनी अधिक रही कि सिखों के प्रमुख पूज्य ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में उनकी वाणी संकलित हैं, जो प्रतिदिन अब भी बडी श्रद्धा से गाई जाती है। संत नामदेव संत कबीर, रैदास,नानक, दादू मलूककी निर्गुण भक्तिधाराके प्रवर्तक होने के कारण स्वयं भी मूर्ति पूजा,कर्मकांड, जाति-पांति व सांप्रदायिकता के कठोर निंदक रहे हैं। परमात्मा की प्राप्ति के लिए संत-सद्गुरु की कृपा को अनिवार्य मानते हैं:-

संत सूंलेना संत सूंदेना,

संत संगति मिली दुस्तर तिरना

संत की छाया संत की माया,

संत संगति मिलिगोविंद पाया॥

संत नामदेव का जन्म 26अक्तूबर,1270 ई.को महाराष्ट्र में नरसीबामनीनामक गांव में हुआ। इनके पिता का नाम दामाशेटथा और माता का नाम गोणाईथा। कुछ विद्वान इनका जन्म स्थान पण्ढरपुरमानते हैं। दामाशेटबाद में पण्ढरपुरआकर विट्ठल की मूर्ति के उपासक हो गए थे। इनका पैतृक व्यवसाय दर्जी का था। अभी नामदेव पांच वर्ष के थे। तब इनके पिता विट्ठल की मूर्ति को दूध का भोग लगाने का कार्य नामदेव को सौंप कर कहीं बाहर चले गए। बालक नामदेव को पता नहीं था कि विट्ठल की मूर्ति दूध नहीं पीती, उसे तो भावनात्मक भोग लगवाया जाता है। नामदेव ने मूर्ति के आगे पीने को दूध रखा। मूर्ति ने दूध पीया नहीं, तो नामदेव हठ ठानकर बैठ गए कि जब तक विट्ठल दूध नहीं पीएंगे, वह वहां से हटेंगे नहीं। कहते हैं हठ के आगे विवश हो विट्ठल ने दूध पी लिया। बडा होने पर इनका विवाह राजाबाईनाम की कन्या से कर दिया गया। इनके चार पुत्र हुए तथा एक पुत्री। इनकी सेविका जानाबाईने भी श्रेष्ठ अभंगोंकी रचना की। पढंरपुरसे पचास कोस की दूरी पर औढियानागनाथ के शिव मंदिर में रहने वाले विसोबाखेचर को इन्होंने अपना गुरु बनाया। संत ज्ञानदेवऔर मुक्ताबाईके सान्निध्य में नामदेव सगुण भक्ति से निर्गुण भक्ति में प्रवृत्त हुए। अवैदएवं योग मार्ग के पथिक बन गए। ज्ञानदेवसे इनकी संगति इतनी प्रगाढ हुई कि ज्ञानदेवइन्हें लंबी तीर्थयात्रा पर अपने साथ ले गए और काशी,अयोध्या,मारवाड (राजस्थान) तिरूपति,रामेश्वरमआदि के दर्शन-भ्रमण किए। फिर सन् 1296में आलंदीमें ज्ञानदेवने समाधि ले ली और तुरंत बाद ज्ञानदेवके बडे भाई तथा गुरु ने भी योग क्रिया द्वारा समाधि ले ली। इसके एक महीने बाद ज्ञानदेवके दूसरे भाई सोपानदेवऔर पांच महीने पश्चात मुक्तबाईभी समाधिस्थ हो गई। नामदेव अकेले हो गए। उन्होंने शोक और विछोह में समाधि के अभंग लिखे। इस हृदय विदारक अनुभव के बाद नामदेव घूमते हुए पंजाब के भट्टीवालस्थान पर पहुंचे। फिर वहां घुमान(जिला गुरदासपुर) नामक नगर बसाया। तत्पश्चात मंदिर बना कर यहीं तप किया और विष्णुस्वामी,परिसाभागवते,जनाबाई,चोखामेला,त्रिलोचन आदि को नाम-ज्ञान की दीक्षा दी। बाद में अस्सी वर्ष की आयु में पढंरपुरमें विट्ठल के चरणों में आषाढ वदीत्रोदशीसंवत 1407तदानुसार3जुलाई 1350ई. को पण्ढरपुरमें ही समाधि ली। संत नामदेव अपनी उच्चकोटि की आध्यात्मिक उपलब्धियों के लिए ही विख्यात हुए। चमत्कारों के सर्वथा विरुद्ध थे। वह मानते थे कि आत्मा और परमात्मा में कोई अंतर नहीं है। तथा परमात्मा की बनाई हुई इस भू (भूमि तथा संसार) की सेवा करना ही सच्ची पूजा है। इसी से साधक भक्त को दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। सभी जीवों का सृष्टाएवं रक्षक, पालनकत्र्ताबीठलराम ही है, जो इन सब में मूर्त भी है और ब्रह्मांड में व्याप्त अमू‌र्त्त भी है। इसलिए नामदेव कहते हैं:-

जत्रजाऊं तत्र बीठलमेला।

बीठलियौराजा रांमदेवा॥

सृष्टि में व्याप्त इस ब्रह्म-अनुभूति के और इस सृष्टि के रूप आकार वाले जीवों के अतिरिक्त उस बीठलका कोई रूप, रंग, रेखा तथा पहचान नहीं है। वह ऐसा परम तत्व है कि उसे आत्मा की आंखों से ही देखा अनुभव किया जा सकता है। संत नामदेव का वारकरीपंथ आज तक उत्तरोत्तर विकसित हो रहा है।

मंदिर-मस्जिद, जात-पांत आदि के भेदभाव से ऊपर उठकर गोविंद का नाम स्मरण करना ही नामदेव की सबसे बडी सीख है:-

सिमिरसिमिरगोविंद

भजुनामा तरसिभव सिंधु॥

अस्सी वर्ष की आयु तक इस संसार में गोविंद के

नाम का जप करते-कराते सन् 1350ई. में नामा स्वयं भी इस भवसागर से पार चले गए। इस धरती पर जीवों के रूप में विचरने वाले गोविंद की सेवा ही सच्ची परमात्मसेवा है।