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Sunday, December 28, 2008
युग प्रवर्तक: हरिवंश महाप्रभु
गौड़ीय संप्रदाय के स्तंभ जीव गोस्वामी
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सच्चे अर्थो में देवर्षि हैं नारद
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ज्ञान और स्वाभिमान के संवाहक परशुराम
शक्ति-संघर्ष का परिणाम अक्सर सुखद नहीं होता। इस तरह समाज की दो धाराओं में द्वंद्व की स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं, लेकिन क्षत्रिय के लिए उपयुक्त कर्म और ब्राह्मणोचितज्ञान में संतुलन के अनुपम उदाहरण परशुराम का सत्तासीन राजा कार्तवीर्यअर्जुन से संघर्ष आवश्यक ही कहा जाएगा। इसके परिणामस्वरूप समाज में विचलन की स्थिति समाप्त हो गई। राजा को शक्ति का दंभ था और ऋषि को ज्ञान पर स्वाभिमान तथा संघर्ष के औचित्य का भान। हैहयवंशके कार्तवीर्यअर्जुन की वंश-बेल 21बार नष्ट करने के पीछे यूं तो परशुराम का प्रतिकार ही प्रमुख था, किंतु ऐसा कर उन्होंने यह बात जरूर स्थापित कर दी कि ज्ञान और तप का सम्मान सबको करना होगा, क्योंकि ये भारतीय संस्कृति के आधार-बिंदु हैं। इतिहास में वर्णित है कि कार्तवीर्यअर्जुन के पुत्रों ने बलपूर्वक कामधेनु गाय प्राप्त करने के लिए ऋषि जमदग्निका वध कर दिया था। कार्तवीर्यको भगवान दत्तात्रेयकी कृपा से हजार भुजाओं का वरदान मिल गया था। दंभ से भरपूर कार्तवीर्यअर्जुन विप्र समाज को हेय समझता था। ब्राह्मणों, विद्वत्जनोंऔर ऋषियों को तिरष्कृतकरना और उनका वध कर देना उसके लिए जैसे कोई खेल था। परशुराम ने इसी का दंड राजा को दिया। ग्रंथों में वर्णित है कि सहस्रबाहुकार्तवीर्यअर्जुन ने भृगुकुल का 21बार मान-हरण किया और प्रतिकार स्वरूप परशुधारीऋषि ने उसके वंश का 21बार संहार भी किया। वैसे, प्रतिशोध का कारण केवल अपमान नहीं था, अर्जुन पुत्रों ने परशुराम के पिता का वध कर दिया, तो ऋषि क्रोधाग्नि से घिर गए। पिता को वे ईश्वर से भी बडा मानते थे। गंधर्व नरेश चित्ररथके प्रति आकृष्ट हुईं मां रेणुका का भी परशुराम ने इसीलिए वध किया था, क्योंकि पिता की ऐसी इच्छा थी। फिर पिता से माता को पुनर्जीवित करने का आशीर्वाद भी मांगा। मान्यता है कि वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को ही त्रेतायुग की शुरुआत हुई थी। यही अवसर था, जब सरस्वती नदी के तट पर बसने वाले ऋषि जमदग्नितथा उनकी पत्नी रेणुका के घर प्रदोषकालमें योग, वेद और नीति में पारंगत, तंत्रकर्मके साधक, ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालक परशुराम का जन्म हुआ था। परशुराम साधारण ऋषि नहीं। पौैराणिक ग्रंथों में बताया गया है कि वे विष्णु के छठे अवतार थे। उन्होंने पशुपति शंकर की निरंतर साधना की। आशीर्वाद स्वरूप शिव ने उन्हें अपना परशु दिया और उसे धारण करने के कारण ही ऋषि को परशुराम, यानी परशु युक्त राम कहा गया। मानव जीवन के सूक्ष्म दर्शन का ज्ञान और आध्यात्मिक उच्चताके शिखर पर स्थापना..यह संतुलन परशुराम ही कर सकते थे, तभी तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भी कहते हैं, हमहि तुम्हहिसरिबरिकस नाथा/ कहहुन कहां चरन कहंमाथा / राम मात्र लघु नाम हमारा / परसुसहित बड नाम तोहारा..।जिन्हें प्रभु नमन करते हों, उनकी महानता के बारे में कहना ही क्या? परशुराम और कार्तवीर्यमें संघर्ष के कारण भारतीय ज्ञान और मीमांसा के प्रति लोगों की आस्था तो बढी, लेकिन कहीं न कहीं दो वर्गो और जातियों में कटुता में भी वृद्धि हुई थी। इसी संदर्भ में श्रीराम की परशुराम से निकटता प्रशंसनीय है, क्योंकि उन्होंने ज्ञान प्रसार और समाज-रक्षा के लिए अस्त्रों के संचालन का दायित्व पुन:अलग-अलग जातियों में जाने देने के लिए परशुराम को प्रेरित किया। कुप्रवृत्तियोंका दमन करने के लिए शस्त्र का प्रयोग करने वाले परशुराम संहार और निर्माण, दोनों में कुशल थे। उन्होंने जाति का नहीं, अवगुण का ही सदैव विरोध किया। जो खल दंड करहुंनहिंतोरा / भ्रष्ट होय श्रुति मारगमोरा (रामचरित मानस, तुलसीदास) की लीक पर चलते हुए ज्ञान और स्वाभिमान के संवाहक संत परशुराम ने ऋषियों के सम्मान की रक्षा की। उन्होंने जातिगत विद्वेष को स्थान कभी नहीं दिया। जनक, दशरथ आदि राजाओं का समुचित सम्मान करने वाले परशुराम ने सीता स्वयंवर में श्रीराम की वास्तविकता जानने के बाद प्रभु के प्रति समर्पण भी किया था। श्रीमद्भागवत महापुराणमें बताया गया है, अश्वत्थामा बलिव्र्यासोहनूमांश्चविभीषण: / कृप:परशुरामश्चसप्तैतेचिरजीविन:।स्पष्ट है कि परशुराम चिरजीवी हैं। अश्वत्थामा,हनुमान और विभीषण की भांति प्रभुस्वरूपपरशुराम के संबंध में भी यह बात मानी जाती है। आज जबकि शास्त्रगतज्ञान, सांस्कृतिक उच्चताकी स्थापना पुन:आवश्यक हो चुकी है, तब भगवान परशुराम से प्रेरणा लेनी ही होगी। |
शांतिपुंज गुरु अर्जुन देव जी
गुरु अर्जुन देव जी शहीदों के सरताज एवं शान्तिपुंजहैं। आध्यात्मिक जगत में गुरु जी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उन्हें ब्रह्मज्ञानी भी कहा जाता है। गुरुग्रंथ साहिब में तीस रागों में गुरु जी की वाणी संकलित है। गणना की दृष्टि से श्री गुरुग्रंथ साहिब में सर्वाधिक वाणी पंचम गुरु की ही है। ग्रंथ साहिब का संपादन गुरु अर्जुन देव जी ने भाई गुरदास की सहायता से 1604में किया। ग्रंथ साहिब की संपादन कला अद्वितीय है, जिसमें गुरु जी की विद्वत्ता झलकती है। उन्होंने रागों के आधार पर ग्रंथ साहिब में संकलित वाणियों का जो वर्गीकरण किया है, उसकी मिसाल मध्यकालीन धार्मिक ग्रंथों में दुर्लभ है। यह उनकी सूझबूझ का ही प्रमाण है कि ग्रंथ साहिब में 36महान वाणीकारोंकी वाणियां बिना किसी भेदभाव के संकलित हुई। अर्जुन देव जी गुरु रामदास के सुपुत्र थे। उनकी माता का नाम बीवी भानी जी था। गोइंदवालसाहिब में उनका जन्म 15अप्रैल 1563को हुआ और विवाह 1579ईसवी में। सिख संस्कृति को गुरु जी ने घर-घर तक पहुंचाने के लिए अथाह प्रयत्न किए। गुरु दरबार की सही निर्माण व्यवस्था में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 1590ई. में तरनतारनके सरोवर की पक्की व्यवस्था भी उनके प्रयास से हुई। ग्रंथ साहिब के संपादन को लेकर कुछ असामाजिक तत्वों ने अकबर बादशाह के पास यह शिकायत की कि ग्रंथ में इस्लाम के खिलाफ लिखा गया है, लेकिन बाद में जब अकबर को वाणी की महानता का पता चला, तो उन्होंने भाई गुरदास एवं बाबा बुढ्ढाके माध्यम से 51मोहरें भेंट कर खेद ज्ञापित किया। गुरु जी शांत और गंभीर स्वभाव के स्वामी थे। वे अपने युग के सर्वमान्य लोकनायक थे, जो दिन-रात संगत सेवा में लगे रहते थे। उनके मन में सभी धर्मो के प्रति अथाह स्नेह था। मानव-कल्याण के लिए उन्होंने आजीवन शुभ कार्य किए। अकबर के देहांत के बाद जहांगीर दिल्ली का शासक बना। वह कट्टर-पंथी था। अपने धर्म के अलावा, उसे और कोई धर्म पसंद नहीं था। गुरु जी के धार्मिक और सामाजिक कार्य भी उसे सुखद नहीं लगते थे। कुछ इतिहासकारों का यह भी मत है कि शहजादा खुसरोको शरण देने के कारण जहांगीर गुरु जी से नाराज था। 15मई, 1606ई. को बादशाह ने गुरु जी को परिवार सहित पकडने का हुक्म जारी किया। तुज्ाके-जहांगीरी के अनुसार उनका परिवार मुरतजाखान के हवाले कर घरबार लूट लिया गया। इस बाद गुरु जी ने शहीदी प्राप्त की। अनेक कष्ट झेलते हुए गुरु जी शांत रहे, उनका मन एक बार भी कष्टों से नहीं घबराया। तपता तवा उनके शीतल स्वभाव के सामने सुखदाईबन गया। तपती रेत ने भी उनकी निष्ठा भंग नहीं की। गुरु जी ने प्रत्येक कष्ट हंसते-हंसते झेलकर यही अरदास की- तेरा कीआमीठा लागे॥ हरिनामुपदारथनानक मांगे॥ गुरु अर्जुन देव जी द्वारा रचित वाणी ने भी संतप्त मानवता को शांति का संदेश दिया। सुखमनी साहिब उनकी अमर-वाणी है। करोडों प्राणी दिन चढते ही सुखमनीसाहिब का पाठ कर शांति प्राप्त करते हैं। सुखमनीसाहिब में चौबीस अष्टपदी हैं। सुखमनीसाहिब राग गाउडीमें रची गई रचना है। यह रचना सूत्रात्मक शैली की है। इसमें साधना, नाम-सुमिरन तथा उसके प्रभावों, सेवा और त्याग, मानसिक दुख-सुख एवं मुक्ति की उन अवस्थाओं का उल्लेख किया गया है, जिनकी प्राप्ति कर मानव अपार सुखोंकी उपलब्धि कर सकता है। सुखमनीशब्द अपने-आप में अर्थ-भरपूर है। मन को सुख देने वाली वाणी या फिर सुखों की मणि इत्यादि। सुखमनीसुख अमृत प्रभु नामु। भगत जनांके मन बिसरामु॥ सुखमनीसाहिब सुख का आनंद देने वाली वाणी है। सुखमनीसाहिब मानसिक तनाव की अवस्था का शुद्धीकरण भी करती है। प्रस्तुत रचना की भाषा भावानुकूलहै। सरल ब्रजभाषा एवं शैली से जुडी हुई यह रचना गुरु अर्जुन देव जी की महान पोथी है। गुरु अर्जुन देव जी की वाणी की मूल- संवेदना प्रेमाभक्तिसे जुडी है। गुरमति-विचारधाराके प्रचार-प्रसार में गुरु जी की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। गुरु जी ने पंजाबी भाषा साहित्य एवं संस्कृति को जो अनुपम देन दी, उसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। इस अवदान का पहला प्रमाण ग्रंथ साहिब का संपादन है। इस तरह जहां एक ओर लगभग 600वर्षो की सांस्कृतिक गरिमा को पुन:सृजित किया गया, वहीं दूसरी ओर नवीन जीवन-मूल्यों की जो स्थापना हुई, उसी के कारण पंजाब में नवीन-युग का सूत्रपात भी हुआ। गुरु जी के शहीदी पर्व पर उन्हें याद करने का अर्थ है, उस धर्म- निरपेक्ष विचारधारा को मान्यता देना, जिसका समर्थन गुरु जी ने आत्म-बलिदान देकर किया था। उन्होंने संदेश दिया था कि महान जीवन मूल्यों के लिए आत्म-बलिदान देने को सदैव तैयार रहना चाहिए, तभी कौम और राष्ट्र अपने गौरव के साथ जीवंत रह सकते हैं। |
समाज सुधारक देशभक्त गुरुनानक देव जी
गुरु नानक देव जी ने एक ऐसे विकट समय में जन्म लिया जब भारत में कोई केंद्रीय संगठित शक्ति नहीं थी। विदेशी आक्रमणकारी देशवासियों का मानमर्दनकर देश को लूटने में लगे थे। धर्म के नाम पर अंधविश्वास और कर्मकांड का बोलबाला था। मतमतांतरोंऔर विदेशी संस्कृति का हमला इस देश की संस्कृति पर हो रहा था। ऐसे कठिन समय में हुए गुरु जी के प्रकाश के बारे में भाई गुरुदास जी ने लिखा है। सतगुरु नानक प्रगटिया,मिटी धुंध जग चानणहोआ,ज्यूं कर सूरज निकलया,तारे छुपे अंधेर पलोआ गुरु नानक देव जी के जीवन के अनेक पहलू हैं। वे जन सामान्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान करने वाले महान दार्शनिक, विचारक थे। अपनी सुमधुर सरल वाणी से जनमानस के हृदय को झंकृत कर देने वाले महान संत कवि भी। गुरु जी के अध्यात्मिक विचारक और संत कवि रूप की चर्चा बहुत हुई है, परंतु उनका एक और रूप है, जिसे उनके व्यक्तित्व का अभिन्न रूप माना जा सकता है। इस रूप में वे क्रांतिकारी कवि की तरह बाबर जैसे अत्याचारीशासक की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो जाति वैमनस्य और धार्मिक रंजिशों में फंसे समाज को सही दिशा दिखाते हैं। गुरु जी के समय हिंदुओं को बलात् धर्म परिवर्तन के लिए तत्कालीन कट्टरपंथी शासक मजबूर कर रहे थे। हिंदु धर्म के अंदर भी वर्णभेद, ऊंच-नीच का जातिगत भेदभाव चरम पर था। गुरु जी ने यह सब देखा। धर्म, समाज एवं देश की अधोगति को उन्होंने अनुभव किया। निरंतर छिन्न-भिन्न होते जा रहे सामाजिक ढांचे को अपने हृदयस्पर्शी उपदेशों से उन्होंने पुन:एकता के सूत्र में बांध दिया। उन्होंने लोगों को बेहद सरल भाषा में समझाया सभी इंसान एक दूसरे के भाई है। ईश्वर सबका साझा पिता है। फिर एक पिता की संतान होने के बावजूद हम ऊंच-नीच कैसे हो सकते है। अव्वल अल्लाह नूर उपाया,कुदरत के सब बंदे एक नूर तेसब जग उपज्या,कौन भले को मंदे। उल्लेखनीय बात यह है कि गुरु जी ने इन उपदेशों को अपने जीवन में अमल में लाकर स्वयं एक आदर्श बन सामाजिक सद्भाव की मिसाल कायम की। उन्होंने लंगर की परंपरा चलाई। जहां कथित अछूत लोग जिनके सामीप्य से कथित उच्च जाति के लोग बचने की कोशिश करते थे, उन्हीं ऊंच जाति वालों के साथ बैठकर एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते थे। आज भी सभी गुरुद्वारों में गुरु जी द्वारा शुरू की गई यह लंगर परंपरा कायम है। लंगर में बिना किसी भेदभाव के संगत सेवा करती है। इस जातिगत वैमनस्य को खत्म करने के लिए गुरू जी ने संगत परंपरा शुरू की। जहां हर जाति के लोग साथ-साथ जुटते थे, प्रभु आराधना किया करते थे। गुरु जी ने अपनी यात्राओं के दौरान हर उस व्यक्ति का आतिथ्य स्वीकार किया, उसके यहां भोजन किया, जो भी उनका प्रेमपूर्वक स्वागत करता था। कथित निम्न जाति के समझे जाने वाले मरदाना को उन्होंने एक अभिन्न अंश की तरह हमेशा अपने साथ रखा और उसे भाई कहकर संबोधित किया। इस प्रकार तत्कालीन सामाजिक परिवेश में गुरु जी ने इस क्रांतिकारी कदमों से एक ऐसे भाईचारे को नींव रखी जिसके लिए धर्म-जाति का भेदभाव बेमानी था। आध्यात्मिक विचारक, संत होने के साथ-साथ गुरु जी एक महान देश भक्त भी थे। वे सच्चे अर्थो में एक क्रांतिकारी युग पुरुष थे। उस समय त्याग, वैराग्य और जंगलों में जाकर भजन करना मोक्ष प्राप्ति के लिए जरूरी समझा जाता था। ऋषि मुनि लोग समाज की मुख्य धारा से कटकर जंगल में जाकर तपस्या करते थे। इस प्रकार बुराईयों से ग्रस्त समाज को सुधारने में उनका कोई योगदान नहीं था। यहां पर गुरु जी ने आगे आकर इन एकांतवासियों को लताडा। उन्हें समझाया कि एक ऐसे समय में जब बाबर जैसे लुटेरे देश को लूट खसोट रहे हैं, औरतों की बेइज्जती हो रही है, ऐसे समय में अपने परिचितों को अकेले छोडकर जंगलों में तपस्या करके वे देश-धर्म और संस्कृति के प्रति कैसी वफादारी निभा रहे है। गुरुनानक देव जी ने उनके स्वाभिमान को सब हराम जेता कीछखाये का उलाहना देकर राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित किया। उन्होंने शासन प्रशासन द्वारा किए जा रहे अत्याचार का करुण वर्णन अपनी वाणी में कर निर्भयता का परिचय दिया। राजे सिंह मुकदमकुते,जाइजगाइनबैठे सुत्तेचाकर तट दा पाइयनघाउ,रत-पितु कुतहिचरिजाहूंइस प्रकार गुरु जी ने जुल्म, अत्याचार का विस्तार सहित वर्णन कर जागरूकता, चेतना कायम की। जहां मधुर सारगुहीउपदेशों से लोगों के हृदय में दया, ईश्वरीय प्रेम, सहिष्णुता के बीजे बोए वहीं क्रान्तिकारी उपदेशों से गुलामी और अत्याचार सहने को अपनी नियति मान चुके लोगों के सोए स्वाभिमान को जगाया। धर्म के नाम पर चल रहे पाखंड, अंधविश्वास और कर्मकाण्डों का गुरु जी ने सख्त विरोध किया। आधुनिक समय में भी गुरुनानक देव जी के उपदेश उतने ही प्रासंगिक हैं। हमें समाज में फैले वैमनस्य, कुरीतियों आडम्बरों के विरुद्ध तो संघर्ष करना ही है, साथ ही साम्प्रदायिकता,जातिवाद के विष से सचेत रहकर हर हालत में आपसी एकता, भाई-बंधुत्व भी बनाये रखना है। |
Friday, December 26, 2008
महर्षि दयानन्द के हृदय में आदर्शवाद की उच्च भावना, यथार्थवादी मार्ग अपनाने की सहज प्रवृत्ति, मातृभूमि की नियति को नई दिशा देने का अदम्य उत्साह, धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक तथा राजनैतिक दृष्टि से युगानुकूलचिंतन करने की तीव्र इच्छा, भारतीय जनता में गौरवमय अतीत के प्रति निष्ठा जगाने की भावना थी। उन्होंने किसी के विरोध तथा निंदा करने की परवाह किए बिना भारत के हिंदू समाज का कायाकल्प करना अपना ध्येय बना लिया था। फाल्गुणकृष्ण संवत् 1895में शिवरात्रि के दिन उनके जीवन में नया मोड आया। उन्हें नयाबोधहुआ। उन्होंने प्रण किया कि मैं सच्चे शिव की खोज करूंगा। वे घर से निकल पडे और यात्रा करते हुआ वह गुरु विरजानन्दके पास पहुंचे। गुरुवरने उन्हें पाणिनीव्याकरण, पातंजल-योगसूत्र तथा सम्पूर्ण वेद-वेदांग का अध्ययन कराया। गुरु दक्षिणा में उन्होंने मांगा-विद्या को सफल कर दिखाओ, परोपकार करो, सत्य शास्त्रों का उद्गार करो,मत मतांतरों की अविद्या को मिटाओ, वेद के प्रकाश से इस अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करो, वैदिक धर्म का आलोक सर्वत्र विकीर्ण करो। यही मेरी गुरुदक्षिणा है। उन्होंने आशीर्वाद दिया, ईश्वर तेरे पुरुषार्थ को सफल करे। उन्होंने अंतिम शिक्षा दी-मनुष्यकृत ग्रंथों में ईश्वर और ऋषियों की निंदा है। ऋषिकृतग्रंथों में नहीं। वेद प्रमाण हैं। इस कसौटी को हाथ से न छोडना। महर्षि दयानन्द ने अनेक स्थानों की यात्रा की। उन्होंने हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर पाखंड खण्डिनीपताका फहराई। उन्होंने अनेक शास्त्रार्थ किए। कलकत्ता में बाबू केशवचंद्र सेन तथा देवेन्द्र नाथ ठाकुर के वे संपर्क में आए। यहीं से उन्होंने पूरे वस्त्र पहनने तथा हिंदी में बोलना व लिखना प्रारंभ किया। यहीं उन्होंने तत्कालीन वाइसराय को कहा था-मैं चाहता हूं विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है। परंतु भिन्न-भिन्न भाषा, पृथक-पृथक शिक्षा, अलग-अलग व्यवहार का छूटना अति दुष्कर है। बिना इसके छूटे परस्पर का व्यवहार पूरा उपकार और अभिप्राय सिद्ध होना कठिन है। महर्षि दयानन्द ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत् 1932(सन् 1975)को गिरगांवबम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की। आर्यसमाज के नियम और सिद्धांत प्राणीमात्रके कल्याण के लिए हैं- संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना। महर्षि दयानन्द ने तत्कालीन समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों तथा अंधविश्वास और रूढियों-बुराइयोंको दूर करने के लिए, निर्भय होकर उन पर आक्रमण किया। वे संन्यासी योद्धा कहलाए। उन्होंने जन्मना जाति का विरोध किया तथा कर्म के आधार वेदानुकूलवर्ण-निर्धारण की बात कही। वे दलितोद्धारके पक्षधर थे। उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा के लिए प्रबल आंदोलन चलाया। उन्होंने बाल विवाह तथा सती प्रथा का निषेध किया तथा विधवा विवाह का समर्थन किया। उन्होंने ईश्वर को ब्रह्मांड का निमित्त कारण तथा प्रकृति को अनादि तथा शाश्वत माना। वे तैत्रवादके समर्थक थे। उनके दार्शनिक विचार वेदानुकूलथे। उन्होंने यह भी माना कि जीव कर्म करने में स्वतंत्र हैं तथा फल भोगने में परतंत्र हैं। महर्षि दयानन्द सभी धर्मानुयायियों को एक मंच पर लाकर एकता स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील थे। उन्होंने दिल्ली दरबार के समय 1878में ऐसा प्रयास किया था। उनके अमरग्रंथसत्यार्थप्रकाश, संस्कार विधि और ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका में उनके मौलिक विचार सुस्पष्ट रूप में प्राप्य हैं। वे योगी थे तथा प्राणायाम पर उनका विशेष बल था। वे सामाजिक पुनर्गठन में सभी वर्णो तथा स्त्रियों की भागीदारी के पक्षणरथे। राष्ट्रीय जागरण की दिशा में उन्होंने सामाजिक क्रांति तथा आध्यात्मिक पुनरुत्थान के मार्ग को अपनाया। उनकी शिक्षा संबंधी धारणाओं में प्रदर्शित दूरदर्शिता, देशभक्ति तथा व्यवहारिकता पूर्णतया प्रासंगिक तथा युगानुकूलहै। महर्षि दयानंद समाज सुधारक तथा धार्मिक पुनर्जागरण के प्रवर्तक तो थे ही, वे प्रचण्ड राष्ट्रवादी तथा राजनैतिक आदर्शवादी भी थे। विदेशियों के आर्यावर्तमें राज्य होने के कारण आपस की फूट, मतभेद, ब्रह्मचर्य का सेवन न करना, विधान पढना-पढाना व बाल्यावस्था में अस्वयंवरविवाह, विषयासक्ति,मिथ्याभाषावादि,कुलक्षण, वेद-विद्या का प्रचार आदि कुकर्म हैं, जब आपस में भाई-भाई लडते हैं और तभी तीसरा विदेशी आकर पंच बन बैठता है। उन्होंने राज्याध्यक्षतथा शासन की विभिन्न परिषदों एवं समितियों के लिए आवश्यक योग्यताओं को भी गिनाया है। उन्होंने न्याय की व्यवस्था ऋषि प्रणीत ग्रंथों के आधार पर किए जाने का पक्ष लिया। उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। स्वधर्म, स्वभाषा, स्वराष्ट्र, स्वसंस्कृतिऔर स्वदेशोन्नतिका वह अग्रदूत सन् 1883में दीपावली के दिन इस असार संसार से चला गया तथा अपने पीछे छोड गया एक सिद्धांत, कृष्णवंतोंविश्वमार्यम्सारे संसार को श्रेष्ठ मानव बनाओ उनके अन्तिम शब्द थे-प्रभु तूने अच्छी लीला की। आपकी इच्छा पूर्ण हो। |
